Wednesday, 28 January 2015

एम. फिल. पाठ्यक्रम , स्त्री अध्ययन विभाग 2015

महात्मा गांधी अन्तरराष्‍ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय वर्धा
एम.फिल. स्त्री-अध्ययन

·         स्त्री-अध्ययन क्यों? आवश्यकता एवं उपादेयता (गैर स्त्री-अध्ययन विद्यार्थियों के लिए)
·         स्त्री आन्दोलन एव स्त्री-अध्ययन - अंर्तसंबंध।
·         स्त्री-अध्ययन की अर्न्तअनुशासनिकता।
·         पितृसत्ता की उत्पत्ति।

पाठ्यक्रम एक
1.       नारीवादी शोध प्रविधि
मुख्यधारा समाजशास्त्रीय शोध-प्रविधि:- कारण, प्रभाव एवं परिकल्पना समस्या चयन, उद्देश्य, संभावना एवं सीमाएँ।
आँकडे के प्रमुख, स्त्रोत गुणात्मक एवं आँकड़ा संकलनः प्राथमिक आँकड़ा संकलन के उपकरण एवं प्रविधि, (क्षेत्र भ्रमण एवं सर्वेक्षण, प्रश्नावली, साक्षात्कार, सहभागी अवलोकन)
द्वितीयक स्त्रोत के आँकड़े का प्रयोग-साहित्य, दृश्य-श्रव्य संसाधन, अभिलेखागार।
आँकड़ा विश्लेषण:- वर्गीकरण एवं विवेचन, सांख्यिकीय उपकरण, परिमाणात्मक आँकड़े का प्रयोग।
शोध प्रपत्र का प्रस्तुतीकरण: उपर्युक्त ढाँचा, तालिकाकरण, आँकड़ो का ग्राफिय प्रस्तुतीकरण, अनुक्रमण एवं संदर्भ तंत्र

2.       मुख्यधारा की शोध प्रविधि की नारीवादी आलोचना
समग्र बनाम खंडित ज्ञान
शोध में सत्त/शक्ति की समस्या

3.       नारीवादी शोध प्रविधि की तकनीक
नारीवादी नृजाति-वर्णन/सर्वेक्षण ;विषय एवं व्यक्ति के मध्य अंतर की समाप्तिद्ध विषय-वस्तु वश्लिेषण, घटना अध्ययन, मौखिक इतिहास, बहुविधा शोध आँकड़ा विश्लेषण (स्त्रियों को केन्द्र में लाने हेतु)

4.       सर्जनात्मक नारीवादी अभिव्यक्ति
सर्जनात्मक विकल्प के उपकरण एवं तकनीक।
नारीवादी सृजनात्मकता का दृश्य एवं अभिनयात्मक प्रस्तुतीकरण



पाठ्यक्रम दो:-
समाजशास्त्र के समकालीन सैळांतिक दृष्टिकोण
·         मार्क्सवाद:-
ऐतिहासिक भैतिकवाद, मानव इतिहास के विभिन्न चरण, पूँजीवादी विकास के सिद्धान्‍त, साम्राज्यवाद, अधिशेष मूल्य, अलगाववाद, उत्तरमार्क्सवादी सिद्धान्‍त, ग्राम्शी का वर्चस्व का सिद्धान्‍त, मार्क्सवादः अनुप्रयोग के रूप में, परिवार, निजी सम्पत्ति एवं राज्य की उत्पत्ति की मार्क्सवादी-नारीवादी व्याख्या।
·         देशजवाद:
स्वायत्ता के लिए विमर्श के केन्द्र में देशज विरोध का सिद्धान्‍त एवं व्यवहार, जेपातिस्ता एवं लौटिन अमेरिका विद्रोह, गांधी, विनोबा, जयप्रकाश के दर्शन से प्रभावित अभियान एवं इन अभियानों में स्त्री प्रश्नों के अवलोकन की दृष्टि।
·         उत्तरसंरचनावाद एवं उत्तर आधुनिकतावाद:-
सार्वभैमिक सामाजिक नियमों के संरचनावाद के दावे का अस्वीकार, बीसवी शताब्दी के मध्य से युरोप में विचार एवं बहस के वैकल्पिक आयाम, देरिदा, फुको, क्रीस्टीवा, लेखक एवं पाठक, सिग्नीफायर एवं सिग्नीफाइड, फ्रेंच नारीवाद पर प्रभाव।
·         सांस्कृतिक सापेक्षतावाद:-
अर्थ एवं उन्नीसवी सदी के नृतत्वशास्त्र के संदर्भ में व्याख्या। आधुनिक समय में सांस्कृतिक सापेक्षतावाद का राजनीतिक अनुप्रयोग सार्वभैमिक मानवाधिकार के संदर्भ में सही और गलत की संकल्पना का अनुप्रयोग पितृसत्ता सभ्यता का नारीवादी आंदोलन द्वारा आलोचना, डब्ल्यु.एल.यु.एम.एफ., डब्ल्यु.ए.एस. का घटना अध्ययन।
·         नारीवाद:-
वर्तमान समय में नारीवादी विमर्श का उद्गम। स्त्री-अध्ययन, स्त्री-आंदोलन एवं नारीवाद।

पाठ्यक्रम तीन:-
·         आलोचनात्मक नारीवादी मुद्दे:-
नारीवादी आंदोलन के विभिन्न धाराओं एवं नारीवादी विचार की व्याख्या की मुख्य संकल्पनाएँ।
1. व्यक्तिगत ही राजनैतिक है, निजी एवं सार्वजनिक
2. हिंसा एवं पितृसत्ता की केन्द्रीयता।
3. पितृसत्ता, परिवार, धर्म, राज्य, कानून, समाजीकरण के संस्थागत स्वरूप
4. उत्पादन, सामाजिक पुर्नउत्पादन एवं पुर्नउत्पादन की राजनीति।
5. सार्वभैमिक भगनीवाद एवं स्टॅण्ड प्वाइन्ट सिद्धान्‍त।

कुल 22 क्रेडिट
प्रत्येक पाठ्यक्रम - 4 क्रेडिट

शोध कार्य हेतु 10 क्रेडिट (8लिखित एवं 2 मौखिकी के लिए)

स्त्री अध्ययन विभाग के पीएच.डी. शोधार्थी

पी-एच.डी. (सत्र 2014) स्‍त्री अध्‍ययन विभाग 
1. मनोज कुमार गुप्‍ता  manojkumar07gupta@gmail.com
2. राजलक्ष्‍मी  rajlakshmikamail@gmail.com
3.कीर्ति शर्मा  kirtisharma8aug@gmail.com
4. मनीष कुमार सिंह  manish.singh12290@gmail.com
5. साकेत बिहारी  lord.saket2002@gmail.com
6. प्रीतिमाला  singh.kanchan477@gmail.com
पी-एच.डी. (सत्र 2011) स्‍त्री अध्‍ययन विभाग 
1. सुश्री चित्रलेखा chitra.anshu4@gmail.com
2. सुश्री रेणु कुमारी  renukumari@gmail.com
3. सुश्री अस्मिता राजुरकर  striasmita@gmail.com
4. सुश्री आकांक्षा  akanksha3105@gmail.com
5. श्री मनोज कुमारद्विवेदी        manoj.manush@gmail.com 
6. श्री राजकुमार  gautamraj123@gmail.com
7. श्री चेतान सोरेन  bale.soren@gmail.com
पी-एच.डी. (सत्र 2012) स्‍त्री अध्‍ययन विभाग 
1. सुश्री आरती कुमारी  kumari.artee88@gmail.com
2. श्री अतुल कुमार मिश्रा  atulmishra.mediagroup@gmail.com
3. श्री अफसर हुसेन खा  afser.niyazi1985@gmail.com
4. श्री राहुल  rahul.or.nishant@gmail.com

स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा 3 दिवसीय चिकलदरा भ्रमण का आयोजन

स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा सत्र 2013-14 के एम. फिल. शोधार्थियों को 3 दिवसीय चिकलदरा भ्रमण के रूप में फेरवेल (विदाई) दी गयी । इस भ्रमण कार्यक्रम में स्त्री अध्ययन के संकाय सदस्य प्रो. वासंती रमन, सुप्रिया पाठक, के अतिरिक्त समाज कार्य के डॉ. मिथलेश तिवारी थे । स्त्री अध्ययन विभाग के अतिरिक्त अहिंसा एवं शांति अध्ययन, समाज कार्य के भी कुछ एम. ए, एम. फिल. एवं पीएच.डी. शोधार्थी शामिल हुए । इस दौरान शोधार्थियों ने प्रो. वासंती रमन के साथ मेलघाट टाइगर रिजर्व के सफारी का आनंद लिया । 17-20 अप्रैल 2014 तक के इस प्रस्तावित भ्रमण कार्यक्रम का प्रथम पड़ाव मेलघाट टाइगर रिजर्व का गेस्ट हाउस था जहां एम. फिल. शोधार्थियों को फेरवेल (विदाई) उपहार दिये गए । तत्पश्चात मनोरंजक अंतराक्षरी कार्यक्रम द्वारा समा बांध दिया ।  इसके अगले सुबह विभाग के प्रो. वासंती रमन के नेतृत्व में कुछ शोधार्थियों ने मेलघाट टाइगर रिजर्व की सफारी का आनंद लिया ।
मेलघाट टाइगर रिजर्व के सफारी का आनंद लेते प्रो. वासंती रमन
एवं शोधार्थी  
तत्पश्चात 30 लोगों का ये पूरा काफिला चिकलदरा जलप्रपात के लिए रवाना हुआ । मार्ग में पड़नेवाले सूर्यास्त पॉइंट्स सहित सभी दर्शनीय स्थानों का लुफ्त उठाते हुए भ्रमण के दूसरे दिन दोपहर चिकलदरा पहुंचा गया । जहां के जलप्रपात समेत बहुत से प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया । चिकलदरा स्थित पार्क में समय बिताने के पश्चात काफिला वापस गेस्ट हाउस पहुंचा । जहां रात्रि विश्राम के पश्चात तीसरे दिन सुवह 10 बजे वर्धा के लिए रवाना हुआ । 
चिकलदरा भ्रमण के समापन के मौके पर मेलघाट के अतिथि गृह में पूरा काफिला 


Tuesday, 27 January 2015

स्त्री अध्ययन विभाग में एम. फिल सत्र 2013-14 की मौखिकी आयोजित

दिनांक 25 अप्रैल 2014 को स्त्री अध्ययन विभाग के एम. फिल. शोधार्थियों की मौखिकी का आयोजन किया गया । बाह्य विशेषज्ञ रूप में कुसुम त्रिपाठी थी । इस दौरान विभाग के अध्यक्ष प्रो. शंभु गुप्त, संकाय सदस्य प्रो. वासंती रमन, सुप्रिया पाठक, अवंतिका शुक्ला मौजूद थे । श्रीमति कुसुम त्रिपाठी ने एम. फिल शोधार्थियों के शोध-प्रबंध की जांच की शोधार्थियों से उनके संबंधित विषय पर बातचित की एवं शोध प्रबंध की कमियों को बताते हुए आवश्यक सलाह भी दिये ।
बाह्य विशेषज्ञ कुसुम त्रिपाठी के साथ उपस्थित विभाग की शिक्षक
एवं एम. फिल. शोधार्थी सत्र 2013-14 

शोध प्रबंध के साथ एम. शोधार्थी सत्र- 2013-14 

स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा एक दिवसीय माँ काली डैम भ्रमण का आयोजन

स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा दिनांक 23 मार्च 2014 को एक दिवसीय माँ काली डैम भ्रमण का आयोजन किया गया । जिसमें स्त्री अध्ययन विभाग के संकाय सदस्य प्रो. वासंती रमन, सुप्रिया पाठक सहित विभाग के एम.ए , एम. फिल, पीएच.डी. के छात्र - छात्राओं ने भाग लिया ।  इसके अतिरिक्त समाजकार्य विभाग के डॉ मिथिलेश तिवारी, लीला के अंजनी राय आदि लोग भी इसमें शामिल हुए । इस मौके पर सभी ने आपसी सहयोग से गीत संगीत के साथ वन भोज का भी आनंद लिया । विभाग के पीएच.डी., एम. फिल. एवं एम. ए के शोधार्थियों/विद्यार्थियों ने इस आयोजन को सफल बनाया । इस भ्रमण कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें .......





  

विभागीय ब्लॉग निर्माण की उद्देश्य

स्त्री अध्ययन विभाग , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र) के 10 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 8 मार्च 2014 को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर विभागीय ब्लॉग का अनावरण माननीय कुलपति प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र जी के द्वारा किया गया । इसके पश्चात विभाग के एम. फिल शोधार्थी साकेत बिहारी ने विभागीय ब्लॉग निर्माण के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्त्री अध्ययन विभाग के उद्देश्यों कि पूर्ति में सहायता के लिए ही इस ब्लॉग का निर्माण किया गया है । इस आधार पर ब्लॉग निर्माण के उद्देश्यों को समझा जा सकता है ।
लैपटाप पर इंटर बटन दबाकर ब्लॉग का अनावरण करते कुलपति जी एवं
ब्लॉग के उद्देश्यों से परिचय कराते एम.फिल शोधार्थी साकेत बिहारी  

ब्लॉग के प्रमुख उद्देश्य 

  • हिंदी माध्यम में व्यवस्था की सत्तापरक संरचना की पड़ताल करते हुए जेंडर संवेदनशील दृष्टिकोण को विकसित करना । 
  • हिन्दी समाज के वृहत्तर परिप्रेक्ष्य में स्त्री विषयक प्रश्नों एवं अधिकारों से विद्यार्थियों को अवगत कराना । 
  • सत्तामूलक एवं एकांगी ज्ञान को चुनौती देते हुए हाशिए के ज्ञान को केंद्र में लाना । 
  • अकादमिक एवं सामाजिक आंदोलनों के बीच संबंध स्थापित करना । 
  • अकादमिक एवं सामाजिक यथार्थ के बीच के अंतर को समाप्त करना । 

स्त्री अध्ययन विभाग द्वारा दो दिवसीय स्त्री आधृत फिल्म महोत्सव का आयोजन

8 मार्च को होने वाले अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर स्त्री अध्ययन विभाग की ओर से दो दिवसीय फिल्म महोत्सव का आयोजन किया गया । जिसका विषय था - "महिलाओं के विरुद्ध हिंसा और सिनेमाई रुख" । कार्यक्रम की शुरुवात दुनिया की उन महिलाओं के लिए कैंडल एवं मशाल जलाकर किया गया जो कभी न कभी किसी तरह की हिंसा का शिकार हुई, जिन्होनें संघर्ष किया, जो मारी गयी एवं जो संघर्ष कर रही हैं ।  
मशाल प्रज्वलित करते कुलपति एवं विभाग के संकाय सदस्य 
प्रथम सत्र की अध्‍यक्षता कर रहे माननीय कुलपति महोदय स्‍त्री अध्‍ययन विभाग को एक जीवंत विभाग बताते हुए 8 मार्च के विभिन्‍न आयामों पर अपने विचार रखा । उन्होनें अपने विचार रखते हुए यह प्रश्न उठाया कि स्त्रियां का पुरूषों के बराबर समानता ही क्‍यों? उससे आगे की बात क्‍यों न करें? उन्‍होंने बच्चियों के कुपोषण और भेदभाव पर सवाल उठाते हुए कहा कि लोग आज भी बेटे और बेटियों के खानपान में भेदभाव करते हैं । साथ ही उन्‍होंने स्‍त्री अध्‍ययन विभाग के विभागाध्‍यक्ष महोदय प्रो. शंभु गुप्‍त द्वारा 12 वें प्‍लान के लिए प्रस्‍तावित 3 बड़े प्रोजेक्‍ट के लिए भी अपनी सहमती दी । कुलपति महोदय ने अध्‍ययन का महत्‍व बताते हुए कहा कि ज्ञान का न केवल, विस्‍तार करें बल्कि समाज से रिश्‍ता भी बनाएं । इस फिल्‍म महोत्‍सव की प्रासंगिकता और महत्‍व के बारे में उन्‍होंने कहा कि जीवन को उजागर क ने में सिनेमा का बड़ा योगदान है ।
कार्यक्रम के प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि वक्ता श्री प्रवीण कुमार, सहायक प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली ने इस अवसर पर बोलते हुए मदर इंडिया, मिर्च मसाला, वाटर जैसी फिल्मों का विशेष रूप से उल्लेख करते हुए इसके स्त्री पात्रों एवं उनके संघर्षों का विस्तार से उल्लेख किया ।
अपने विचार रखते अतिथि वक्ता श्री प्रवीण कुमार 
इस सत्र में दूसरी अतिथि वक्‍ता थीं अमरावती वि.वि
. की डॉ. निशा शेंडे । डॉ. निशा ने महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा के विभिन्‍न स्‍वरूपों पर चर्चा करते हुए कहा कि महिला आंदोलन की सबसे ज्‍़यादा ज़रूरत जहां है वहां है ही नहीं । उन्‍होंने अपने यहां काम करनेवाली एक महिला चंदाबाई के बारे में कहा कि कल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है तो उसने सवाल किया कि अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस क्‍या होता है ? इसलिए इस महिला दिवस को श्रमिक वर्ग तक पहुंचना ज़रूरी है ।
अपने विचार रखते अतिथि वक्ता डॉ. निशा शेण्डे 
इस सत्र का स्‍वागत भाषण स्‍त्री अध्‍ययन विभाग के विभागाध्‍यक्ष महोदय प्रो. शंभु गुप्‍त द्वारा दिया गया । अपने भाषण में उन्‍होंने वहां उपस्थित सभी विद्वदजनों, अतिथियों तथा छात्राओं-छात्रों का स्‍वागत करते हुए 8 मार्च की प्रासंगिकता, स्‍त्री के प्रति सिनेमाई रूख़ को स्‍त्री अध्‍ययन जैसे विषय से जोड़ते हुए कहा कि स्‍त्री अध्‍ययन जितना अनुशासन है उतना यह व्‍यवहार भी है । उन्‍होंने स्‍त्री अध्‍ययन के संदर्भ में Field Work की महत्‍ता और जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि सारे निष्‍कर्ष और सिद्धांत वहीं से निकल कर आते हैं ।
संबोधित करते विभागाध्यक्ष प्रो. शंभु गुप्त 
स्‍त्री अध्‍ययन विभाग की तीन बड़ी परियोजनाओं के बारे में भी उन्‍होंने बताया जो 12 वें प्‍लान में प्रस्‍तावित है । 
इस सत्र में बोलते हुए नाट्यकला एवं फिल्‍म अध्‍ययन विभाग के विभागाध्‍यक्ष प्रो. सुरेश शर्मा ने स्‍त्री के प्रति हिंसा और सिनेमाई रूख़ पर मूक से लेकर सवाक़ फिल्‍मों का जिक्र किया। उन्‍होंने इस परंपरा की सबसे पहली फिल्‍म '‍हरिश्‍चंद्र' को बताया जब 'जिंदगी','देवदास','औरत','अछूत कन्‍या','मदर इंडिया','बंदिनी','अंकूर','मिर्च मसाला','गुलाब गैंग' इत्‍यादि फिल्‍मों में स्‍त्री के प्रति सिनेमाई रूख़ की चर्चा की । इस सत्र का प्रास्‍थानिक वक्‍तव्‍य स्‍त्री अध्‍ययन विभाग में प्रोफेसर सुश्री वासंती रमण ने दिया । 8 मार्च की प्रासंगिकता विषय पर बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि पूरे विश्‍व में महिलाओं का संघर्ष किसी एक आयाम को लेकर नहीं रहा है, बल्कि समग्रता में उनका संघर्ष रहा है । उन्‍होंने 19 वीं और बीसवीं शताब्‍दी में दुनिया में विशेषकर पश्चिमी देशों में गैरबराबरी, शोषण के खिलाफ महिलाओं के आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि उन महिलाओं ने ‘ब्रेड एण्‍ड रोजेज’ का नारा दिया । ‘बेड एण्‍ड रोजेज' यानि हमारा संघर्ष सिर्फ रोटी के लिए नहीं है, हमारी लड़ाई ईज्‍ज़त, सम्‍मान की लड़ाई भी है, समानता की लड़ाई भी है । इस दिवस की प्रासंगिकता पर बोलते हुए उन्‍होंने कहा कि ज्ञान का मक़सद होता है परिवर्तन,बेहतर समाज की रचना और यह सिर्फ़ महिलाओं की जिम्‍मेदारी नहीं है और उनके साथ होनेवाली हिंसा, उनका संघर्ष सिर्फ महिलाओं का संघर्ष नहीं है । प्रो. वसंती रामन ने आह्वान किया – संघर्ष – हिंसा के खिलाफ, संघर्ष गैर- बराबरी के खिलाफ़, सामाजिक न्‍याय के पक्ष को मजबूत करने और नए समाज की रूपरेखा बनाने का । प्रथम उद्धाटन सत्र का धन्‍यवाद ज्ञापन किया स्‍त्री अध्‍ययन विभाग की सहायक प्रोफेसर अवंतिका शुक्‍ला ने । इस दिवस की महत्ता पर बोलते हुए उन्होनें आगाह किया कि 8 मार्च का दिन, विशेषकर श्रमिक महिलाओं और उनके संघर्ष से जुड़ा है । प्रथम सत्र का संचालन और इस पूरे कार्यक्रम का संयोजन स्‍त्री अध्‍ययन विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. सुप्रिया पाठक द्वारा किया गया । अपने संचालन और संयोजन में डॉ. सुप्रिया पाठक ने स्‍त्री के प्रति हिंसा और स्‍त्री के जीवन का सिनेमा से अंतर्संबधों का जिक्र किया ।प्रथम सत्र में एक पाकिस्‍तानी फिल्‍म दिखाई गई – ‘सेविंग फेसेज/ पाकिस्‍तान में हर साल लगभग 100 केस एसिड हमले से पीडि़त महिलाओं के सामने आते हैं, जिनमें उनके घर वाले, विशेषकर पति शामिल होते हैं, उन्‍हीं महिलाओं की सत्‍यकथाओं की दास्‍तां, उनकी पीड़ा, उनका संघर्ष और उनमें से कुछ की जीत । इसी की कहानी है –‍ फिल्‍म- ‘सेविंग फेसेज’ जिसके निर्देशक हैं – डेनियल जंग’।
      इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए दूसरे सत्र में भी कुछ फिल्‍में दिखाई गईं । एक फिल्‍म थी – ‘आई-एम’। ओनीर द्वारा निर्देशित वर्ष 2011 में आई यह फिल्‍म सच्‍ची घटनाओं पर आधारित है । इस फि़ल्‍म में चार अलग-अलग कहानियां हैं । पहली कहानी की मुख्‍य पात्र एक स्‍त्री है जिसे नंदिता दास ने अभिनीत किया है । एक ऐसी स्‍त्री जो आधुनिक युग की नई चिकित्‍सा तकनीक से अकेले मां बनकर अकेले जीना चाहती है । इसके लिए वह किसी पुरूष का साथ नहीं चाहती और एक स्‍पर्म डोनर से स्‍पर्म लेती है । वह इन सारे सवालों को खारिज करती है कि वह अकेली कैसे मां बनेगी और इसका दायित्‍व उठाएगी। वह सिर्फ एक प्रश्‍न रखती है कि यदि मैं अकेली अपनी जिंदगी जी सकती हूं तो अकेली मां क्‍यों नहीं हो सकती । इस कडी में 'आई एम' की अगली फिल्‍म कश्‍मीर की पृष्‍ठ भूमि से संबंध रखता है। किस तरह संगीनों के साए में डरी-सहमी जिंदगियां हैं, टूटे- बिखरे, नष्‍ट किए गए घर और वहां से उजड़े हुए लोगों के साथ वहां – रह रहे लोगों की त्रासदी हम फिल्‍म के कुछ दृश्‍यों में देखते हैं। दुनिया भर के नस्‍लों, जातियों, समुदायों के संघर्ष और हिंसा में लाखों-करोड़ों लोग मारे गए हैं और अब भी यह जारी है। इस हिंसा का सबसे क्रूरतम शिकार स्‍त्री होती है। चाहे किसी भी रूप में हो। इस फिल्‍म के मुख्‍य पात्रों को मनीषा कोईराला और जूही चावला ने अभिनीत किया है। एक स्‍त्री पात्र भयावह माहौल में जी रही है। एक अजीब सा भय, एक अजीब सा मातमी सन्‍नाटा छाया है और वहीं उसकी दोस्‍त आती है अपने बिखरे, खंडहर हुए घर को देखती है जिसे 20 साल पहले आधी रात में छोड़कर उसका परिवार शरणार्थी हो जाता है। उसकी आंखों में क्रोध है, घृणा है । दोनों सहोलियों की आंखों में और जुबान पर कई सवाल हैं कि ये भय किसलिए? ये मातम किसलिए?  ये हिंसा और नफरत का परिवेश किसलिए? क्‍या इसलिए कि हम अलग समुदायों, या नस्‍लों या जातियों से हैं? और यह कबतक चलता रहेगा? इसी सत्र में वाणी सुब्रहमणियम द्वारा निर्मित एक वृत्तचित्र दिखाया गया जो स्‍त्री केन्द्रित था तथा इसमें स्‍त्री हिंसा से जुड़े सवाल उठाए गए हैं।
      इस अवसर पर वि.वि. की शोधार्थी मेधा आचार्या की प्रेंटिग की प्रदर्शनी भी की गई। इस कार्यक्रम के आयोजन में स्‍त्री अध्‍ययन विभाग के विभिन्‍न छात्र-छात्राओं ने भी भाग लिया- मनोज कुमार गुप्‍ता, साकेत बिहारी, डिप्‍पल, आरती, शबाना रेणु कुमारी, कीर्ति, राजकुमार, विकास,सरिता, अतुल, राहुल, मनोज, राजलक्ष्‍मी, अस्मिता, आकांक्षा, श्‍याम प्रकाश, चित्रलेखा, मंजु, जयप्रकाश, दिपाली, शिल्‍पा, रेखा, अफसर हुसैन, शबाना। इस कार्यक्रम में विश्‍वविद्यालय के विभिन्‍न संकाय सदस्‍यों, विद्वतजन एवंम कार्मचारीगण भी उपस्थित थे । द्वितीय सत्र का संचालन स्‍त्री अध्‍ययन विभाग की छात्रा प्रीतिमाला सिंह द्वारा किया गया ।
आयोजन को सफल बनानेवाले विभाग के शोधार्थी एवं कर्मचारी